विंध्याचल स्थानीय
माँ विंध्यवासिनी देवी मंदिर विंध्याचल में, मिर्जापुर से 8 किमी दूर और भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में पवित्र गंगा नदी के किनारे इलाहाबाद (प्रयाग) से लगभग 80 किमी दूर स्थित है। यह पीठासीन देवता, मां विंध्यवासिनी देवी के सबसे प्रतिष्ठित शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर में प्रतिदिन भारी संख्या में लोग आते हैं। चैत्र (अप्रैल) और अश्विन (अक्टूबर) महीनों में नवरात्रों के दौरान बहुत बड़ी मंडलियां आयोजित की जाती हैं। परंपरा गीत (कजली) प्रतियोगिताएं ज्येष्ठ (जून) के महीने में होती हैं। मंदिर काली खोह से मात्र 2 किमी की दूरी पर स्थित है, जो एक प्राचीन गुफा मंदिर है जो देवी काली को समर्पित है। 70 किमी। (डेढ़ घंटे की ड्राइव) वाराणसी से, विंध्याचल देवी विंध्यवासिनी को समर्पित एक प्रसिद्ध धार्मिक शहर है। पौराणिक रूप से देवी विंध्यवासिनी को बेंडक्शन के तुरंत सबसे अच्छा माना जाता है। आसपास में अन्य देवताओं के कई मंदिर हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध अष्टभुजा देवी मंदिर और कालीखोह मंदिर हैं, जो त्रिकोना परिक्रमा (परिधि) का निर्माण करते हैं। विंध्यवासिनी देवी मंदिर, अष्टभुजा मंदिर, देवी महासरस्वती को समर्पित (एक होली पर, विंध्यवासिनी मंदिर से 3 किमी) और काली खोह मंदिर, जो देवी काली (विंध्यवासिनी मंदिर से 2 किमी) को समर्पित है, त्रिकोन परिक्रमा का निर्माण करती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण का लालन-पालन करने वाली माँ यशोदा की पुत्री मथुरा के दुष्ट राजा कंस की पकड़ से चमत्कारिक ढंग से छूट कर यहाँ अवतीर्ण हुई थी। देवी अष्टभुजा को समर्पित यह मंदिर देवी विंध्यवासिनी मंदिर से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी की एक गुफा में स्थित है। उसी पहाड़ी पर 3 पवित्र जल निकाय हैं – सीता कुंड,मोतिया तालाब और गेरुआ तालाब।

सीता कुण्ड मिर्जापुर में स्थित है। अष्टभुजा मंदिर के पश्चिम दिशा की ओर सीता जी ने एक कुंड खुदवाया था। उस समय से इस जगह को सीता कुंड के नाम से जाना जाता है। कुंड के समीप ही सीता जी ने भगवान शिव की स्थापना की थी। जिस कारण यह स्थान सीतेश्‍वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सीता कुंड के पश्चिम दिशा की तरफ भगवान श्री राम चंद्र ने एक कुंड खोदा था। जिसे राम कुण्ड के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त शिवपुर स्थित लक्ष्मण जी ने रामेश्‍वर लिंग के समीप शिवलिंग की स्थापना की थी, जो कि लक्ष्मणेश्‍वर के नाम से प्रसिद्ध है।

अनन्त ब्रह्माण्ड अधीश्वरी का धाम :

श्री विन्ध्याचल धाम

देवी भक्तों का विश्व प्रसिद्ध धाम है उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विन्ध्य पहाड़ियों पर स्थित आदि शक्ति श्री दुर्गा जी का मन्दिर, जिसे दुनिया विन्ध्याचल मंदिर के नाम से पुकारती है !

यह आदि शक्ति माता विंध्यवासिनी का धाम अनादी काल से ही साधकों के भी लिए प्रिय सिद्धपीठ रहा है। विंध्याचल मंदिर पौराणिक नगरी काशी से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है।

देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है विंध्याचल। सबसे खास बात यह है कि यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों देवियों के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

तीनों के केन्द्र में हैं मां विंध्यवासिनी। यहां निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं।

पूर्व में इसका नाम कुवाईघाट था जिसका उल्लेख जेम्स प्रिंसेप (सन् 1831) ने किया है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में घाट पर नारदेश्वर (शिव) मंदिर का निर्माण हुआ, जिससे घाट का नाम परिवर्तित होकर नारद घाट पड़ा। ऐसी मान्यता है कि नारदेश्वर शिव की स्थापना देवर्षि नारद ने किया था। उन्नींसवीं शताब्दी के अन्त में दक्षिण भारतीय स्वामी सतीवेदान्द दत्तात्रेय ने घाट का पक्का निर्माण कराया, घाट के ऊपरी भाग पर दत्तात्रेयेश्वर (शिव) मंदिर की स्थापना एवं दत्तात्रेय मठ का निर्माण कराया। घाट पर अत्रीश्वर मंदिर (उन्नीसवीं शताब्दी) एवं बीसवीं शताब्दी में स्थापित एक शिव मंदिर भी है। घाट पर एक विशाल पीपल वृक्ष है, जिसके छांव में 12-13वीं शताब्दी के खण्डित विष्णु मूर्तियों के अवशेष हैं। स्थानीय एवं धार्मिक प्रवृत्ति के लोग यहाँ स्नान आदि कार्य करते हैं। राज्य सरकार ने सन् 1965 में घाट का पुनः निर्माण कराया था।

विंध्य धाम पर अवस्थित मोतिया तालाब और गेरुआ तालाब के प्रति भी लोगों की अगाध आस्था है। मान्यता है कि तालाबों में स्नान, ध्यान के बाद पास बने मंदिरों में पूजन से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। नवरात्र के समय जिले में आने वाले हजारों श्रद्धालु इसमें स्नान करते हैं। दोनों ही तालाब विंध्य पर्वत के प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम भेंट हैं। बिंदु की अधिष्ठात्री मां विंध्यवासिनी विंध्य पर्वत पर तीन बिंदु पर अपनी तीन महाशक्तियों के साथ विराजमान हैं।

विंध्य धाम पर अवस्थित मोतिया तालाब और गेरुआ तालाब के प्रति भी लोगों की अगाध आस्था है। मान्यता है कि तालाबों में स्नान, ध्यान के बाद पास बने मंदिरों में पूजन से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। नवरात्र के समय जिले में आने वाले हजारों श्रद्धालु इसमें स्नान करते हैं। दोनों ही तालाब विंध्य पर्वत के प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम भेंट हैं। बिंदु की अधिष्ठात्री मां विंध्यवासिनी विंध्य पर्वत पर तीन बिंदु पर अपनी तीन महाशक्तियों के साथ विराजमान हैं।

मोतिया तालाब सरोवर के उत्तरी तट पर मुक्तेश्वर नाथ का शिवलिंग भी स्थापित है, जिनके दर्शन और सरोवर में स्नान मात्र से मुक्ति मिल जाती है। सरोवर की ऐसी मान्यता है कि कुत्ता काटने पर यहां स्नान कर लेने मात्र से विष तत्काल समाप्त हो जाता है। तालाब के विषय में पुराणों में लिखा है कि जो भी भक्त इस सरोवर में स्नान कर मुक्तेश्वर नाथ जी की पूजा करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।

इस सरोवर के जल स्पर्श मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है। विंध्याचल के वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित पं. त्रियोगी नारायण मिश्र ने बताया कि गेरुआ तालाब ही विंध्य पर्वत पर वह स्थान है, जहां पर ब्रह्म के उपासक आदिगुरु शंकराचार्य जी को मां विंध्यवासिनी की शक्ति की अनुभूति हुई थी। आदिगुरु शंकराचार्य जी ने लिखा था कि किसी भी साधक की साधना तब तक पूर्ण नहीं मानी जाएगी, जब तक वह विंध्याचल की इस धरा पर आकर मां विंध्यवासिनी के चरण रज को प्राप्त नहीं कर लेगा। गेरुआ तालाब जहां ब्रह्म शक्ति के साथ जुड़ा है, वहीं मोतिया तालाब मुक्ति के साथ जुड़ा है।

कालभैरव का यह मंदिर लगभग छह हजार साल पुराना माना जाता है। यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है। वाम मार्ग के मंदिरों में माँस, मदिरा, बलि, मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। प्राचीन समय में यहाँ सिर्फ तांत्रिको को ही आने की अनुमति थी। वे ही यहाँ तांत्रिक क्रियाएँ करते थे और कुछ विशेष अवसरों पर काल भैरव को मदिरा का भोग भी चढ़ाया जाता था। कालान्तर में ये मंदिर आम लोगों के लिए खोल दिया गया, लेकिन बाबा ने भोग स्वीकारना यूँ ही जारी रखा।

काल भैरव के मदिरापान के पीछे क्या राज है, इसे लेकर लंबी-चौड़ी बहस हो चुकी है। पीढ़ियों से इस मंदिर की सेवा करने वाले राजुल महाराज बताते हैं, उनके दादा के जमाने में एक अँग्रेज अधिकारी ने मंदिर की खासी जाँच करवाई थी। लेकिन कुछ भी उसके हाथ नहीं लगा… उसने प्रतिमा के आसपास की जगह की खुदाई भी करवाई, लेकिन नतीजा सिफर। उसके बाद वे भी काल भैरव के भक्त बन गए। उनके बाद से ही यहाँ देसी मदिरा को वाइन उच्चारित किया जाने लगा, जो आज तक जारी है।

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि उनका एक दांत किसी और ने नहीं स्‍वयं उनके भ्राता कुमार कार्तिकेय ने ही तोड़ा था। एक बार कुमार कार्तिकेय किसी ग्रंथ की रचना कर रहे थे, तभी गणेशजी ने अपनी नटखट शरारतों से परेशान कर रखा था कि उन्‍होंने गणेशजी का एक दांत ही तोड़ दिया। जब गणेशजी ने इस बारे में अपने पिता शिवजी से इसकी श‌िकायत की तो कार्त‌िकेय ने दांत गणेश जी को वापस कर द‌िया लेक‌िन एक शाप भी दे द‌िया क‌ि गणेश जी को अपने हाथ में हमेशा दांत पकड़े रहना होगा। अपने से दांत अलग करने पर गणेश जी भस्‍म हो जाएंगे।

साक्षी गोपाल मंदिर ओड़ीशा राज्य के पुरी ज़िले में स्थित हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। कालान्तर में यह विग्रह श्रीजगन्नाथ पुरी में पधारे तथा वहाँ से 12 मील दूर सत्यवादीपुर में अब विराजमान हैं। अब सत्यवादीपुर को साक्षी गोपाल के नाम से ही जाना जाता है।

ऊँ शिव गोरक्ष :-

गोरक्ष टिला स्थान पर स्नान कुण्ड जो राजस्थानी भाषा में ढाब के नाम से जानी जाती हैं
यहाँ पर प्रतिवर्ष भाद्रपद माह में लगने वाले मेले मे लगभग लाखों की सख्याँ मैं यात्री स्नान करते है

सप्त सरोवर (सात झाल) पीलीभीत टाइगर रिजर्व का एक खूबसूरत स्थल है। बराही रेंज में स्थित सात झाल पुरानी नहर का अवशेष है। वर्ष 1926 में जब बाइफरकेशन परियोजना के तहत नहरों का निर्माण कराया गया था तो अतिरिक्त पानी शारदा में छोड़े जाने के लिए एक आउटलेट नहर बनाई गई थी। जब 1951 में शारदा सागर डैम बनाया गया तो इस नहर को बंद करके डैम को भरने के लिए सीधी नहर बना दी गई। पुरानी नहर के अवशेष ही सात झील के रूप में जाने जाते हैं। डीएम रहते अदिति ¨सह ने इस स्थान की फे¨सग कराकर एक सुंदर दो मंजिला लकड़ी का बंगला एवं दो हटें बनवाई थीं। झील को नहर से पानी देने की योजना भी तैयार की गई थी ताकि पर्यटकों को लुभाया जा सके। इस स्थल का जंगल व पर्यटन के बोर्डों में प्रचार प्रसार भी कराया गया था। यह बोर्ड पर्यटकों को सप्त सरोवर की ओर आकर्षित करते हैं लेकिन शायद ही पर्यटक इस खूबसूरत स्थान तक पहुंच पाएं। कारण साफ है जंगल में स्थित सात झाल बाइफरकेशन से करीब 5 किमी दूर है और जंगल मार्ग से कोर जोन में पर्यटकों को जाने दिया जाए या नहीं इस पर वनाधिकारी मंथन कर रहे हैं। सेल्हा बाबा मजार के आगे बसी सेल्हा कालोनी वाले रास्ते से ही वहां पहुंचा जा सकता है लेकिन इस मार्ग पर भी जंगल के रास्ते ही जाना होगा। यदि पर्यटकों को जंगल में घुमाने की बात हो तो सात झाल को बाइफरकेशन तरफ से रास्ता दिया जाना चाहिए। इससे पर्यटक एक पंथ दो काज कर सकेंगे। बराही रेंजर मो. शहनयाज ने बताया कि अभी सात झाल पहुंचने के रास्ते पर निर्णय नहीं हुआ है। आला अधिकारी जैसा आदेश देंगे उसी के अनुरूप काम होगा।

अधिकांश शहर ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा स्थापित किए गए थे, लेकिन प्रारंभिक विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी “लॉर्ड मार्कक्वेस वेलेस्ले” के सबसे प्रसिद्ध अधिकारी द्वारा स्थापित किया गया था। कुछ सबूतों के मुताबिक ब्रिटिश निर्माण की शुरूआत बरीर (बरिया) घाट से हुई थी। लॉर्ड वेलेस्ले ने बंगाल घाट को गंगा द्वारा मिर्जापुर में एक मुख्य प्रवेश द्वार के रूप में पुनर्गठित किया है। मिर्जापुर में कुछ जगह लॉर्ड वेलेस्ले के नाम के अनुसार, वेलेस्लेगंज (मिर्जापुर में पहला बाजार), मुकेरी बाजार, तुलसी चौक इत्यादि के नाम के रूप में घोषित किया गया। नगर निगम की इमारत भी ब्रिटिश कंस्रक्शंस का एक अनमोल उदाहरण है। यह भारत में स्थित है जहां पवित्र नदी गंगा विंध्य रेंज से मिलती है। यह हिंदू पौराणिक कथाओं में महत्वपूर्ण माना जाता है और वेदों में इसका उल्लेख है मिर्जापुर के पास एक धार्मिक स्थल विंध्याचल की स्थापना की विन्ध्याचल, शक्ति पीठ, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में तीर्थस्थान का केंद्र है। यहां स्थित विंध्यवासिनी देवी मंदिर एक प्रमुख आकर्षण है और देवी के आशीर्वादों का आह्वान करने के लिए चैत्र और अश्विन महीने के नवरात्रियों के दौरान हजारों भक्तों द्वारा भरे हुए हैं। शहर में अन्य पवित्र स्थान हैं: अशतभुजा मंदिर, सीता कुंड, काली खोह, बुदे नाथ मंदिर, नारद घाट, गरुआ तालाब, मोतिया तालाब, लाल भैरव और काल भैरव मंदिर, एकदांत गणेश, सप्त सरोवर, साक्षी गोपाल मंदिर, गोरक्ष-कुंड, मत्स्येंद्र कुंड, तारकेश्वर नाथ मंदिर, कणकली देवी मंदिर, शिवशिव समोह अवधुत आश्रम और भैरव कुंड। मिर्जापुर निकटतम रेलवे स्टेशन है। विंध्याचल में पास के शहरों में नियमित बस सेवाएं हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन मिर्जापुर में है नियमित बस सेवाएं, विंध्याचल को पास के कस्बों तक जोड़ती हैं। 25 जनवरी, 2017 को गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड प्रमाणपत्र को सबसे बड़ा रंगोली पैटर्न के लिए प्रशासक बनाया गया। मिर्जापुर जिले के मतदान के प्रति जागरूकता की दिशा में एक कदम 39,125 वर्ग मीटर के क्षेत्र में बनाया गया सबसे बड़ा रंगोली (अल्पाणा) के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ आया। राष्ट्रीय मतदाता दिवस (हिंदी: राष्ट्रीय मतदाता दिवस) के अवसर पर लगभग 50 स्कूलों के लगभग 3500 छात्रों और शिक्षकों द्वारा लगभग 120,000 किलो रंग। यह शहर नदी गंगा के तट पर स्थित है।

तारकेश्वर महादेव मंदिर उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर शहर में स्थित है।विन्ध्याचल के पूर्व में स्थित तारकेश्‍वर महादेव का वर्णन पुराण में भी किया गया है। मंदिर के समीप एक कुण्ड स्थित है। माना जाता है कि तराक नामक असुर ने मंदिर के समीप एक कुण्ड खोदा था। भगवान शिव ने ही तराक का वध किया था। इसलिए उन्हें तारकेश्‍वर महादेव भी कहा जाता है। कुण्ड के समीप काफी सारे शिवलिंग स्थित है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने तारकेश्‍वर के पश्चिम दिशा की ओर एक कुण्ड का खोदा था और भगवान शिव के मंदिर का निर्माण किया था। इसके अतिरिक्त, ऐसा भी कहा जाता है कि तारकेश्‍वर देवी लक्ष्मी का निवास स्थल है। देवी लक्ष्मी यहां अन्य रूप में देवी सरस्वती के साथ वैष्णवी रूप में निवास करती है।

विंध्याचल(मीरजापुर) : विंध्य पहाड़ी की तलहटी में करीब पांच सौ फीट नीचे जड़ी-बूटियों से मिश्रित जल का सेवन करने भैरव कुंड पर देवीभक्तों का सैलाब मंगलवार को भी उमड़ा रहा। पहाड़ी पर त्रिकोण करने के बाद थके हारे भक्तों का जत्था कुंड पर पहुंचता है। लोग पानी लेकर अपने घर जाते हैं। भैरव कुंड से जल लेकर जा रहे हैं बिहार के सासाराम निवासी सुरेश का कहना है कि बीस साल से मां के दरबार में दर्शन-पूजन करने आ रहे हैं। हर बार पानी यहां से ले जाते हैं। यहां का जड़ी-बूटियों से मिश्रित जल पाचन शक्ति को बढ़ाता है। शरीर के लिए रामबाण साबित हो रहा है। सूखा की वजह से कुंड का जल सूख रहा है। अब तो जल प्रवाह बंद सा हो गया है। जून में तो यहां पर रहने वालों को पानी संकट से जूझना पड़ता है। बड़ा ही मनोरम दृश्य रहता है यहां का। घने पेड़ों की शीतलता देख यहां से जाने का मन नहीं करता है। पेड़ों पर उछल कूद कर रहे बंदरों, यहां पर तंत्र साधना में लीन संत महात्माओं के लिए कुंड का जल ही सहारा है। लखनऊ से आये दर्शनार्थियों का कहना है कि मां अष्टभुजा का दर्शन करने के बाद वे लोग हवन कुंड का जल लेने जरूर आते हैं। यहां का पानी अनेक रोगों के निवारण में भी काम आता है। पहाड़ी पर कई स्थानों पर बोर हो जाने की वजह से कुंड में जल प्रवाह कम हो जाता है।

मां विन्ध्यवासिनी मंदिर अष्टभुजा मंदिर
सीता कुंड काली खोह
नारद घाट गेरुआ तालाब
मोतिया तालाब लाल भैरव और काल भैरव मंदिर
एकदंत गणेश साक्षी गोपाल मंदिर
गोरक्ष-कुंड सप्त सरोवर
मत्स्येंद्र कुंड तारकेश्वर नाथ मंदिर
  भैरव कुंड
मिर्जापुर शहर
माँ विंध्यवासिनी देवी मंदिर विंध्याचल में, मिर्जापुर से 8 किमी दूर और भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में पवित्र गंगा नदी के किनारे इलाहाबाद (प्रयाग) से लगभग 80 किमी दूर स्थित है। यह पीठासीन देवता, मां विंध्यवासिनी देवी के सबसे प्रतिष्ठित शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर में प्रतिदिन भारी संख्या में लोग आते हैं। चैत्र (अप्रैल) और अश्विन (अक्टूबर) महीनों में नवरात्रों के दौरान बहुत बड़ी मंडलियां आयोजित की जाती हैं। परंपरा गीत (कजली) प्रतियोगिताएं ज्येष्ठ (जून) के महीने में होती हैं। मंदिर काली खोह से मात्र 2 किमी की दूरी पर स्थित है, जो एक प्राचीन गुफा मंदिर है जो देवी काली को समर्पित है। 70 किमी। (डेढ़ घंटे की ड्राइव) वाराणसी से, विंध्याचल देवी विंध्यवासिनी को समर्पित एक प्रसिद्ध धार्मिक शहर है। पौराणिक रूप से देवी विंध्यवासिनी को बेंडक्शन के तुरंत सबसे अच्छा माना जाता है। आसपास में अन्य देवताओं के कई मंदिर हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध अष्टभुजा देवी मंदिर और कालीखोह मंदिर हैं, जो त्रिकोना परिक्रमा (परिधि) का निर्माण करते हैं। विंध्यवासिनी देवी मंदिर, अष्टभुजा मंदिर, देवी महासरस्वती को समर्पित (एक होली पर, विंध्यवासिनी मंदिर से 3 किमी) और काली खोह मंदिर, जो देवी काली (विंध्यवासिनी मंदिर से 2 किमी) को समर्पित है, त्रिकोन परिक्रमा का निर्माण करती हैं।

  बुदेह नाथ मंदिर
इलाहाबाद
वाराणसी