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माँ विंध्यवासिनी मंदिर

माँ विन्ध्यवासिनी या मां विंध्याचल वाली के नाम से प्रसिद्ध देवी को समर्पित यह प्रसिद्ध मंदिर पूरे धार्मिक क्षेत्र विंध्य क्षेत्र या विंध्याचल का केंद्र बिंदु है। वास्तव में माँ विन्ध्यवासिनी मंदिर जोकि पूरे विंध्याचल क्षेत्र के सबसे प्रमुख मंदिर है पूरे विंध्याचल सहित पवित्र नदी गंगा नदी के तट पर स्थित है। दरअसल, यह एक मंदिर नहीं है, बल्कि कई देवी-देवताओं को समर्पित अनेक मंदिरों का एक परिसर है, जैसे देवी काली, देवी सरस्वती, भगवान शिव, दिव्य युगल राधा- कृष्ण, भगवान हनुमान और भगवान भैरव आदि। हालांकि, इनमें सबसे प्रमुख माँ विन्ध्यवासिनी को समर्पित मंदिर है।
 
माँ विन्ध्यवासिनी सहित इस मंदिर परिसर में स्थित अधिकांश मूर्तियां काले पत्थर की है। इस मंदिर में स्थापित मां विंध्यवासिनी की मूर्ति मैं वह शेर पर स्थित है। वह हिंदू देवी की त्रिमूर्ति में से देवी लक्ष्मी का प्रतिनिधित्व करती है।
 
विन्ध्यवासिनी मंदिर मैं दर्शनार्थी प्रतिदिन भारी संख्या में आते हैं लेकिन मंगलवार, पूर्णिमा, छुट्टियों के दिन और विशेष रूप से नवरात्रि (शाब्दिक अर्थ- नौ रातों) में भक्तों की भारी भीड़ मां विंध्यवासिनी के दर्शन और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आती है।
 
मां विंध्यवासिनी को उनके भक्त माई विंध्याचल माई या विंध्यवासिनी माई के नाम से भी पुकारते हैं। वह भारत के 2 राज्यों बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिष्ठात्री देवी हैं और यहां स्थित सभी लोगों की कुलदेवी भी है। इसके अतिरिक्त भारत के कई क्षेत्रों में बसे हुए लोगों की जैसे महाराष्ट्र राजस्थान और यहां तक दक्षिण भारत के में भी बसे हुए अनेक कुलों और परिवारों की वह परंपरागत रूप से कुलदेवी है और विंध्याचल में स्थित रह करके वह इन सब की संरक्षा नियमित रूप से और सक्रिय रूप से करती रहती है।
 
पौराणिक रूप से, मां विन्ध्यवासिनी मार्कंडेय पुराण के दुर्गा सप्तशती खंड में वर्णित महिषासुरमर्दिनि है जिन्होंने महिषासुर दानव का देवताओं के निवेदन पर संहार किया था।

 
माँ विंध्यवासिनी का मंत्र-

ओम ह्रीं महालक्ष्म्यै नमः (ॐ ह्रीं महालक्ष्म्यै नमः)