Stotra-and-Chalisa-of-Various-God-Goddesses-and-Navgrahas
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STOTRA & CHALISA OF VARIOUS GOD, GODDESSES & NAVGRAHAS:

विभिन्न देवी – देवताओं तथा नवग्रहों से सम्बंधित स्तोत्र एवं चालीसा:

Shree Vindhyeshwari Chalisa (श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा)

॥ दोहा ॥

नमो नमो विन्ध्येश्वरी, नमो नमो जगदंब।
संत जनों के काज में, करती नहीं बिलंब॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय बिंध्याचल रानी ।
आदि सक्ति जगबिदित भवानी ॥

सिंह बाहिनी जय जगमाता। 
जय जय जय त्रिभुवन सुखदाता॥ 

कष्ट निवारिनि जय जग देवी। 
जय जय संत असुर सुरसेवी ॥ 

महिमा अमित अपार तुम्हारी । 
सेष सहस मुख बरनत हारी ॥ 

दीनन के दुख हरत भवानी । 
नहिं देख्यो तुम सम कोउ दानी ॥ 

सब कर मनसा पुरवत माता ।
महिमा अमित जगत बिख्याता।। 

जो जन ध्यान तुम्हारो लावे ।
सो तुरतहिं बांछित फल पावे ॥  

तू ही बैस्नवी तू ही रुद्रानी । 
तू ही सारदा अरु ब्रह्मानी ॥  

रमा राधिका स्यामा काली । 
तू ही मात संतन प्रतिपाली ॥ 

उमा माधवी चंडी ज्वाला । 
बेगि मोहि पर होहु दयाला ॥  

तुम ही हिंगलाज महरानी । 
तुम ही सीतला अरु बिज्ञानी ॥  

तुम्ही लच्छमी जग सुख दाता ।
दुर्गा दुर्ग बिनासिनि माता ॥ 

तुम ही जाह्नवी अरु उन्नानी । 
हेमावती अंबे निरबानी ॥  

अष्टभुजी बाराहिनि देवा । 
करत बिस्नु सिव जाकर सेवा ॥ 

चौसट्टी देबी कल्यानी।
गौरि मंगला सब गुन खानी ॥ 

पाटन मुंबा दंत कुमारी । 
भद्रकाली सुन बिनय हमारी॥  

बज्रधारिनी सोक नासिनी । 
आयु रच्छिनी बिंध्यबासिनी ॥  

जया और बिजया बैताली । 
मातु संकटी अरु बिकराली ॥

नाम अनंत तुम्हार भवानी।
बारनै किमि मानुष अज्ञानी ॥ 

जापर कृपा मातु तव होई ।
तो वह करै चहै मन जोई ॥ 

कृपा करहु मोपर महारानी । 
सिध करिये अब यह मम बानी ॥ 

जो नर धेरै मातु कर ध्याना । 
ताकर सदा होय कल्याना ॥ 

बिपति ताहि सपनेहु नहि आवै । 
जो देबी का जाप करावै ॥ 

जो नर कहे रिन होय अपारा। 
सो नर पाठ करे सतबारा ।। 

निःचय रिनमोचन होड़ जाई । 
जो नर पाठ करे मन लाई ॥  

अस्तुति जो नर पढ़ें पढ़ावै । 
या जग में सो बहु सुख पावै ॥  

जाको ब्याधि सतावै भाई।
जाप करत सब दूर पराई ॥ 

जो नर अति बंदी महँ होई ।
बार हजार पाठ कर सोई ॥ 

निःचय बंदी ते छुटि जाई । 
सत्य बचन मम मानहु भाई ॥ 

जापर जो कुछ संकट होई । 
निःचय देबिहि सुमिरै सोई ॥ 

जा कहँ पुत्र होय नहि भाई । 
सो नर या बिधि करै उपाई ॥  

पाँच बरष सो पाठ करावै । 
नौरातर महँ बिप्र जिमावै ॥ 

निःचय होहि प्रसन्न भवानी । 
पुत्र देहि ताकहँ गुन खानी ॥ 

ध्वजा नारियल आन चढ़ावै । 
बिधि समेत पूजन करवावै ॥ 

नित प्रति पाठ करै मन लाई ।
प्रेम सहित नहि आन उपाई ॥ 

यह श्री बिंध्याचल चालीसा । 
रंक पढ़त होवै अवनीसा ॥ 

यह जनि अचरज मानहु भाई ।
कृपा दृष्टि जापर है जाई ॥  

जय जय जय जग मातु भवानी । 
कृपा करहु मोहि पर जन जानी ॥ 

॥ श्रीविन्ध्येश्वरीचालीसा सम्पूर्ण ॥

सुन मेरी देवी पर्वत वासिनी, तेरा पार न पाया ॥ टेक ॥
पान सुपारी ध्वाजा नारियल, ले तेरी भेंट चढ़ाया ॥ सुन० ॥
सुवा चोली तेरे अंग बिराजे, केसर तिलक लगाया ॥ सुन० ॥
नंगे पैरों अकबर आया, सोने का छत्र चढ़ाया ॥ सुन० ॥
ऊँचे ऊँचे पर्वत बन्यो दिवालो नीचे शहर बसाया ॥ सुन० ॥
सत्युग, द्वापर, त्रेता मध्ये, कालियुग राज सवाया ॥ सुन० ॥
धूप दीप नैवेंद्य आरती, मोहन भोग लगाया ॥ सुन० ॥
ध्यानू भगत मैया तेरे गुण गावैं, मनवांछित फल पाया ॥ सुन० ॥

ॐ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥


नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥ 

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूं लोक फैली उजियारी॥ 

शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥ 

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥ 

तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥ 

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥ 

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥ 

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥ 

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥ 

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥ 

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥ 

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥ 

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥ 

मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥ 

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥ 

केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥ 

कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥ 

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥ 

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुंलोक में डंका बाजत॥ 

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥ 

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥ 

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥ 

परी गाढ़ संतन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥ 

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥ 

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥ 

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥ 

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥ 

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥ 

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥ 

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥ 

शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥ 

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥ 

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥ 

मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥ 

आशा तृष्णा निपट सतावें।
रिपू मुरख मौही डरपावे॥ 

शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥ 

करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥ 

जब लगि जिऊं दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥ 

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥ 

देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ 

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥

|| श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्र ||

निशुम्भ शुम्भ गर्जनी, प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी।
बनेरणे प्रकाशिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥ 

त्रिशूल मुण्ड धारिणी, धरा विघात हारिणी।
गृहे-गृहे निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥ 

दरिद्र दुःख हारिणी, सदा विभूति कारिणी।
वियोग शोक हारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

लसत्सुलोल लोचनं, लतासनं वरप्रदं।
कपाल-शूल धारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

कराब्जदानदाधरां, शिवाशिवां प्रदायिनी।
वरा-वराननां शुभां भजामि विन्ध्यवासिनी॥ 

कपीन्द्न जामिनीप्रदां, त्रिधा स्वरूप धारिणी।
जले-थले निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

विशिष्ट शिष्ट कारिणी, विशाल रूप धारिणी
महोदरे विलासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

पुंरदरादि सेवितां, पुरादिवंशखण्डितम्‌।
विशुद्ध बुद्धिकारिणीं, भजामि विन्ध्यवासिनीं॥ 

॥ इति श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्र सम्पूर्ण ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।

। इति मंत्रः ।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ।।1।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।।2।।

ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तु ते।।3।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।।4।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ।।5।।

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ।।6।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।7।।

पां  पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।8।।

इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।।
यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ।।

॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव री ॥टेक॥

मांग सिंदूर बिराजत टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना चंद्रबदन नीको ॥जय॥

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै ॥जय॥ 

केहरि वाहन राजत खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर मुनिजन सेवत तिनके दुःखहारी ॥जय॥

कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर राजत समज्योति ॥जय॥

शुम्भ निशुम्भ बिडारे महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती ॥जय॥

चौंसठ योगिनि मंगल गावैं नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू ॥जय॥

भुजा चार अति शोभित खड्ग खप्परधारी।
मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी ॥जय॥

कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत कोटि रतन ज्योति ॥जय॥

श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी सुख-सम्पत्ति पावै ॥जय॥

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
 
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे।
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
॥ इति शिव चालीसा ॥ 

॥ दोहा ॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। 

॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।1।।

रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।12।। 

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।3।। 

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।4।। 

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।।5।।  

संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।6।। 

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।7।।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।8।। 

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।9।। 

भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।10।। 

लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।11।। 

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।12।। 

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।।।13।। 

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।14।। 

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।15।। 

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।16।। 

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।17।। 

जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।18।। 

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।19।। 

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।20।।

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।21।। 

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।22।। 

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।23।। 

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।24।। 

नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।25।। 

संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।26।। 

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।।27।। 

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।28।। 

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।29।। 

साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।30।। 

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।301।। 

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।32।।

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।33।। 

अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।34।। 

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।35।। 

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।36।। 

जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।37।।

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।।38।। 

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।39।। 

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।40।। 

॥ दोहा ॥

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

॥ दोहा॥

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥ 

सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।
ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

॥ सोरठा॥
 
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥
जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥
तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥
त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥
भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥
रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

॥ दोहा॥

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥

रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥ 

।। इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णम।।

॥ दोहा ॥

ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचंड।
शांति कांति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखंड ॥1॥

जगत जननी मंगल करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥ २॥

॥ चौपाई ॥

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी । 
गायत्री नित कलिमल दहनी ॥॥ 

अक्षर चौबीस परम पुनीता । 
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥॥ 

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा । 
सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥॥

हंसारूढ श्वेतांबर धारी । 
स्वर्ण कांति शुचि गगन-बिहारी ॥॥ 

पुस्तक पुष्प कमंडलु माला । 
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥॥ 

ध्यान धरत पुलकित हित होई । 
सुख उपजत दुख दुर्मति खोई ॥॥ 

कामधेनु तुम सुर तरु छाया । 
निराकार की अद्भुत माया ॥॥ 

तुम्हरी शरण गहै जो कोई । 
तरै सकल संकट सों सोई ॥॥ 

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली । 
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥॥ 

तुम्हरी महिमा पार न पावैं । 
जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥॥ 

चार वेद की मात पुनीता । 
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥॥ 

महामंत्र जितने जग माहीं । 
कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥ 

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै । 
आलस पाप अविद्या नासै ॥॥ 

सृष्टि बीज जग जननि भवानी । 
कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥ 

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते । 
तुम सों पावें सुरता तेते ॥॥ 

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे । 
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥॥ 

महिमा अपरम्पार तुम्हारी । 
जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥॥ 

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना । 
तुम सम अधिक न जगमें आना ॥॥ 

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा । 
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा ॥॥ 

जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई । 
पारस परसि कुधातु सुहाई ॥॥ 

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई । 
माता तुम सब ठौर समाई ॥॥ 

ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे । 
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥॥ 

सकल सृष्टि की प्राण विधाता । 
पालक पोषक नाशक त्राता ॥॥ 

मातेश्वरी दया व्रत धारी । 
तुम सन तरे पातकी भारी ॥॥ 

जापर कृपा तुम्हारी होई । 
तापर कृपा करें सब कोई ॥॥ 

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें । 
रोगी रोग रहित हो जावें ॥॥ 

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा । 
नाशै दुख हरै भव भीरा ॥॥ 

गृह क्लेश चित चिंता भारी । 
नासै गायत्री भय हारी ॥॥ 

संतति हीन सुसंतति पावें । 
सुख संपति युत मोद मनावें ॥॥

 भूत पिशाच सबै भय खावें । 
यम के दूत निकट नहिं आवें ॥॥ 

जो सधवा सुमिरें चित लाई । 
अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥॥ 

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी । 
विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥॥ 

जयति जयति जगदंब भवानी । 
तुम सम ओर दयालु न दानी ॥॥ 

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे । 
सो साधन को सफल बनावे ॥॥ 

सुमिरन करे सुरूचि बडभागी । 
लहै मनोरथ गृही विरागी ॥॥ 

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता । 
सब समर्थ गायत्री माता ॥॥ 

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी । 
आरत अर्थी चिंतित भोगी ॥॥ 

जो जो शरण तुम्हारी आवें । 
सो सो मन वांछित फल पावें ॥॥ 

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ । 
धन वैभव यश तेज उछाउ ॥॥ 

सकल बढें उपजें सुख नाना । 
जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥॥

॥ दोहा ॥

यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । 
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥

॥ दोहा॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥

॥ चौपाई॥

जयति जयति शनिदेव दयाला ।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥ 

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै ।
माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥ 

परम विशाल मनोहर भाला ।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके ।
हिय माल मुक्तन मणि दमके ॥ 

कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥ 

पिंगल, कृष्णों, छाया नन्दन ।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन ॥ 

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा ।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥ 

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं ।
रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥

पर्वतहू तृण होई निहारत ।
तृणहू को पर्वत करि डारत ॥ 

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो ।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥ 

बनहूँ में मृग कपट दिखाई ।
मातु जानकी गई चुराई ॥ 

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा ।
मचिगा दल में हाहाकारा ॥

रावण की गतिमति बौराई ।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥ 

दियो कीट करि कंचन लंका ।
बजि बजरंग बीर की डंका ॥ 

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा ।
चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥ 

हार नौलखा लाग्यो चोरी ।
हाथ पैर डरवाय तोरी ॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ॥ 

विनय राग दीपक महं कीन्हयों ।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥ 

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी ।
आपहुं भरे डोम घर पानी ॥ 

तैसे नल पर दशा सिरानी ।
भूंजीमीन कूद गई पानी ॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।
पारवती को सती कराई ॥ 

तनिक विलोकत ही करि रीसा ।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥ 

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।
बची द्रौपदी होति उघारी ॥ 

कौरव के भी गति मति मारयो ।
युद्ध महाभारत करि डारयो ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।
लेकर कूदि परयो पाताला ॥ 

शेष देवलखि विनती लाई ।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥ 

वाहन प्रभु के सात सजाना ।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥ 

जम्बुक सिंह आदि नख धारी ।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं ।
हय ते सुख सम्पति उपजावैं ॥ 

गर्दभ हानि करै बहु काजा ।
सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥ 

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥ 

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी ।
चोरी आदि होय डर भारी ॥

तैसहि चारि चरण यह नामा ।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥ 

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥ 

समता ताम्र रजत शुभकारी ।
स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी ॥ 

जो यह शनि चरित्र नित गावै ।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला ।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥ 

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥ 

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।
दीप दान दै बहु सुख पावत ॥ 

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

॥ दोहा॥

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥

॥ दोहा ॥

जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥ 
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
दुष्टजनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥

॥ चौपाई ॥

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। 
जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥

जय जय जय वीणाकर धारी। 
करती सदा सुहंस सवारी॥  

रूप चतुर्भुज धारी माता। 
सकल विश्व अन्दर विख्याता॥  

जग में पाप बुद्धि जब होती। 
तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥

तब ही मातु का निज अवतारी। 
पाप हीन करती महतारी॥  

वाल्मीकिजी थे हत्यारा। 
तव प्रसाद जानै संसारा॥  

रामचरित जो रचे बनाई। 
आदि कवि की पदवी पाई॥  

कालिदास जो भये विख्याता। 
तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

तुलसी सूर आदि विद्वाना। 
भये और जो ज्ञानी नाना॥  

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा। 
केवल कृपा आपकी अम्बा॥  

करहु कृपा सोइ मातु भवानी। 
दुखित दीन निज दासहि जानी॥  

पुत्र करहिं अपराध बहूता। 
तेहि न धरई चित माता॥   

राखु लाज जननि अब मेरी। 
विनय करउं भांति बहु तेरी॥  

मैं अनाथ तेरी अवलंबा। 
कृपा करउ जय जय जगदंबा॥  

मधु-कैटभ जो अति बलवाना। 
बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥  

समर हजार पांच में घोरा। 
फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥ 

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला। 
बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥  

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। 
पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥  

चंड मुण्ड जो थे विख्याता। 
क्षण महु संहारे उन माता॥  

रक्त बीज से समरथ पापी। 
सुरमुनि हृदय धरा सब कांपी॥

काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा। 
बार-बार बिन वउं जगदंबा॥  

जगप्रसिद्ध जो शुंभ-निशुंभा। 
क्षण में बांधे ताहि तू अम्बा॥  

भरत-मातु बुद्धि फेरेऊ जाई। 
रामचन्द्र बनवास कराई॥  

एहिविधि रावण वध तू कीन्हा। 
सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥

को समरथ तव यश गुन गाना। 
निगम अनादि अनंत बखाना॥  

विष्णु रुद्र जस कहिन मारी। 
जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥  

रक्त दन्तिका और शताक्षी। 
नाम अपार है दानव भक्षी॥  

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। 
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥ 

दुर्ग आदि हरनी तू माता। 
कृपा करहु जब जब सुखदाता॥  

नृप कोपित को मारन चाहे। 
कानन में घेरे मृग नाहे॥  

सागर मध्य पोत के भंजे। 
अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥  

भूत प्रेत बाधा या दुःख में। 
हो दरिद्र अथवा संकट में॥

नाम जपे मंगल सब होई। 
संशय इसमें करई न कोई॥  

पुत्रहीन जो आतुर भाई। 
सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥  

करै पाठ नित यह चालीसा। 
होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥  

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै। 
संकट रहित अवश्य हो जावै॥

भक्ति मातु की करैं हमेशा। 
निकट न आवै ताहि कलेशा॥  

बंदी पाठ करें सत बारा। 
बंदी पाश दूर हो सारा॥  

रामसागर बांधि हेतु भवानी। 
कीजै कृपा दास निज जानी॥

॥ दोहा ॥

मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप। 
डूबन से रक्षा करहु परूं न मैं भव कूप॥ 
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।
राम सागर अधम को आश्रय तू ही देदातु॥ 

(इति शुभम)

॥ चौपाई ॥

श्री रघुबीर भक्त हितकारी।सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई।ता सम भक्त और नहीं होई॥

ध्यान धरें शिवजी मन मांही।ब्रह्मा, इन्द्र पार नहीं पाहीं॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना।जासु प्रभाव तिहुं पुर जाना॥

जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला।सदा करो संतन प्रतिपाला॥
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला।रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥

तुम अनाथ के नाथ गोसाईं।दीनन के हो सदा सहाई॥
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं।सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥

चारिउ भेद भरत हैं साखी।तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
गुण गावत शारद मन माहीं।सुरपति ताको पार न पाहिं॥

नाम तुम्हार लेत जो कोई।ता सम धन्य और नहीं होई॥
राम नाम है अपरम्पारा।चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो।तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥
शेष रटत नित नाम तुम्हारा।महि को भार शीश पर धारा॥

फूल समान रहत सो भारा।पावत कोऊ न तुम्हरो पारा॥
भरत नाम तुम्हरो उर धारो।तासों कबहूं न रण में हारो॥

नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा।सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी।सदा करत सन्तन रखवारी॥

ताते रण जीते नहिं कोई।युद्ध जुरे यमहूं किन होई॥
महालक्ष्मी धर अवतारा।सब विधि करत पाप को छारा॥

सीता राम पुनीता गायो।भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥
घट सों प्रकट भई सो आई।जाको देखत चन्द्र लजाई॥

जो तुम्हरे नित पांव पलोटत।नवो निद्धि चरणन में लोटत॥
सिद्धि अठारह मंगलकारी।सो तुम पर जावै बलिहारी॥

औरहु जो अनेक प्रभुताई।सो सीतापति तुमहिं बनाई॥
इच्छा ते कोटिन संसारा।रचत न लागत पल की बारा॥

जो तुम्हरे चरणन चित लावै।ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥
सुनहु राम तुम तात हमारे।तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥

तुमहिं देव कुल देव हमारे।तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥
जो कुछ हो सो तुमहिं राजा।जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥

राम आत्मा पोषण हारे।जय जय जय दशरथ के प्यारे॥
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा।नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा॥

सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी।सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै।सो निश्चय चारों फल पावै॥

सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं।तुमने भक्तिहिं सब सिधि दीन्हीं॥
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा।नमो नमो जय जगपति भूपा॥

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा।नाम तुम्हार हरत संतापा॥
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया।बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन।तुम ही हो हमरे तन-मन धन॥
याको पाठ करे जो कोई।ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥

आवागमन मिटै तिहि केरा।सत्य वचन माने शिव मेरा॥
और आस मन में जो होई।मनवांछित फल पावे सोई॥

तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै।तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥
साग पत्र सो भोग लगावै।सो नर सकल सिद्धता पावै॥

अन्त समय रघुबर पुर जाई।जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥
श्री हरिदास कहै अरु गावै।सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥

॥ दोहा॥

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय। 
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय॥ 

।।इतिश्री प्रभु श्रीराम चालीसा समाप्त:।।

॥ दोहा॥

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुणअधरजनु बिम्बफल, नयनकमलअभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

॥ चौपाई ॥

जय यदुनंदन जय जगवंदन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥

जय नट-नागर, नाग नथइया।
कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥

वंशी मधुर अधर धरि टेरौ।
होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥

आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥

राजित राजिव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥

कुंडल श्रवण, पीत पट आछे।
कटि किंकिणी काछनी काछे॥

नील जलज सुन्दर तनु सोहे।
छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥

मस्तक तिलक, अलक घुंघराले।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥

करि पय पान, पूतनहि तार्‌यो।
अका बका कागासुर मार्‌यो॥

मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला।
भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥

सुरपति जब ब्रज चढ़्‌यो रिसाई।
मूसर धार वारि वर्षाई॥

लगत लगत व्रज चहन बहायो।
गोवर्धन नख धारि बचायो॥

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥

दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।
चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥

करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूरण करी अभिलाषा॥

केतिक महा असुर संहार्‌यो।
कंसहि केस पकड़ि दै मार्‌यो॥

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।
उग्रसेन कहं राज दिलाई॥

महि से मृतक छहों सुत लायो।
मातु देवकी शोक मिटायो॥

भौमासुर मुर दैत्य संहारी।
लाये षट दश सहसकुमारी॥

दै भीमहिं तृण चीर सहारा।
जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥

असुर बकासुर आदिक मार्‌यो।
भक्तन के तब कष्ट निवार्‌यो॥

दीन सुदामा के दुख टार्‌यो।
तंदुल तीन मूंठ मुख डार्‌यो॥

प्रेम के साग विदुर घर मांगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥

लखी प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

भारत के पारथ रथ हांके।
लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥

निज गीता के ज्ञान सुनाए।
भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥

मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥

राना भेजा सांप पिटारी।
शालीग्राम बने बनवारी॥

निज माया तुम विधिहिं दिखायो।
उर ते संशय सकल मिटायो॥

तब शत निन्दा करि तत्काला।
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।
दीनानाथ लाज अब जाई॥

तुरतहि वसन बने नंदलाला।
बढ़े चीर भै अरि मुंह काला॥

अस अनाथ के नाथ कन्हइया।
डूबत भंवर बचावइ नइया॥

'सुन्दरदास' आस उर धारी।
दया दृष्टि कीजै बनवारी॥

नाथ सकल मम कुमति निवारो।
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥

खोलो पट अब दर्शन दीजै।
बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥

॥ दोहा॥

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

॥ दोहा॥

श्री गणपति गुरु गौरी पद प्रेम सहित धरि माथ।
चालीसा वंदन करो श्री शिव भैरवनाथ॥

श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल।
श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल॥

॥ चौपाई॥

जय जय श्री काली के लाला।
जयति जयति काशी- कुतवाला॥

जयति बटुक- भैरव भय हारी।
जयति काल- भैरव बलकारी॥

जयति नाथ- भैरव विख्याता।
जयति सर्व- भैरव सुखदाता॥

भैरव रूप कियो शिव धारण।
भव के भार उतारण कारण॥

भैरव रव सुनि हवै भय दूरी।
सब विधि होय कामना पूरी॥

शेष महेश आदि गुण गायो।
काशी- कोतवाल कहलायो॥

जटा जूट शिर चंद्र विराजत।
बाला मुकुट बिजायठ साजत॥

कटि करधनी घुंघरू बाजत।
दर्शन करत सकल भय भाजत॥

जीवन दान दास को दीन्ह्यो।
कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो॥

वसि रसना बनि सारद- काली।
दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली॥

धन्य धन्य भैरव भय भंजन।
जय मनरंजन खल दल भंजन॥

कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा।
कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा॥

जो भैरव निर्भय गुण गावत।
अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत॥

रूप विशाल कठिन दुख मोचन।
क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन॥

अगणित भूत प्रेत संग डोलत।
बम बम बम शिव बम बम बोलत॥

रुद्रकाय काली के लाला।
महा कालहू के हो काला॥

बटुक नाथ हो काल गंभीरा।
श्‍वेत रक्त अरु श्याम शरीरा॥

करत नीनहूं रूप प्रकाशा।
भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा॥

रत्‍न जड़ित कंचन सिंहासन।
व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन॥

तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं।
विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं॥

जय प्रभु संहारक सुनन्द जय।
जय उन्नत हर उमा नन्द जय॥

भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय।
वैजनाथ श्री जगतनाथ जय॥

महा भीम भीषण शरीर जय।
रुद्र त्रयम्बक धीर वीर जय॥

अश्‍वनाथ जय प्रेतनाथ जय।
स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय॥

निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय।
गहत अनाथन नाथ हाथ जय॥

त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय।
क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय॥

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय।
कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय॥

रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर।
चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर॥

करि मद पान शम्भु गुणगावत।
चौंसठ योगिन संग नचावत॥

करत कृपा जन पर बहु ढंगा।
काशी कोतवाल अड़बंगा॥

देयं काल भैरव जब सोटा।
नसै पाप मोटा से मोटा॥

जनकर निर्मल होय शरीरा।
मिटै सकल संकट भव पीरा॥

श्री भैरव भूतों के राजा।
बाधा हरत करत शुभ काजा॥

ऐलादी के दुख निवारयो।
सदा कृपाकरि काज सम्हारयो॥

सुन्दर दास सहित अनुरागा।
श्री दुर्वासा निकट प्रयागा॥

श्री भैरव जी की जय लेख्यो।
सकल कामना पूरण देख्यो॥

॥ दोहा॥

जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार।
कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार।।

जो यह चालीसा पढ़े, पाठ करें मन लाय।
सो सुख पावे जगत में, काल निकट नहिं जाय।।

।।इति श्री भैरव चालीसा समाप्त:।।

।।स्तुति।।

मात शैल्सुतास पत्नी ससुधाश्रंगार धरावली ।
स्वर्गारोहण जैजयंती भक्तीं भागीरथी प्रार्थये।।

।।दोहा।।

जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग।
जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग।।

॥ चौपाई ॥

जय जय जननी हराना अघखानी ।
आनंद करनी गंगा महारानी ॥

जय भगीरथी सुरसरि माता ।
कलिमल मूल डालिनी विख्याता ॥

जय जय जहानु सुता अघ हनानी ।
भीष्म की माता जगा जननी ॥

धवल कमल दल मम तनु सजे ।
लखी शत शरद चंद्र छवि लजाई ॥

वहां मकर विमल शुची सोहें ।
अमिया कलश कर लखी मन मोहें ॥

जदिता रत्ना कंचन आभूषण ।
हिय मणि हर, हरानितम दूषण ॥

जग पावनी त्रय ताप नासवनी ।
तरल तरंग तुंग मन भावनी ॥

जो गणपति अति पूज्य प्रधान ।
इहूं ते प्रथम गंगा अस्नाना ॥

ब्रह्मा कमंडल वासिनी देवी ।
श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि ॥

साथी सहस्त्र सागर सुत तरयो ।
गंगा सागर तीरथ धरयो ॥

अगम तरंग उठ्यो मन भवन ।
लखी तीरथ हरिद्वार सुहावन ॥

तीरथ राज प्रयाग अक्षैवेता ।
धरयो मातु पुनि काशी करवत ॥

धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीधी ।
तरनी अमिता पितु पड़ पिरही ॥

भागीरथी ताप कियो उपारा ।
दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा ॥

जब जग जननी चल्यो हहराई ।
शम्भु जाता महं रह्यो समाई ॥

वर्षा पर्यंत गंगा महारानी ।
रहीं शम्भू के जाता भुलानी ॥

पुनि भागीरथी शम्भुहीं ध्यायो ।
तब इक बूंद जटा से पायो ॥

ताते मातु भें त्रय धारा ।
मृत्यु लोक, नाभा, अरु पातारा ॥

गईं पाताल प्रभावती नामा ।
मन्दाकिनी गई गगन ललामा ॥

मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी ।
कलिमल हरनी अगम जग पावनि ॥

धनि मइया तब महिमा भारी ।
धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी ॥

मातु प्रभवति धनि मंदाकिनी ।
धनि सुर सरित सकल भयनासिनी ॥

पन करत निर्मल गंगा जल ।
पावत मन इच्छित अनंत फल ॥

पुरव जन्म पुण्य जब जागत ।
तबहीं ध्यान गंगा महं लागत ॥

जई पगु सुरसरी हेतु उठावही ।
तई जगि अश्वमेघ फल पावहि ॥

महा पतित जिन कहू न तारे ।
तिन तारे इक नाम तिहारे ॥

शत योजन हूं से जो ध्यावहिं ।
निशचाई विष्णु लोक पद पावहीं ॥

नाम भजत अगणित अघ नाशै ।
विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे ॥

जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना ।
धर्मं मूल गंगाजल पाना ॥

तब गुन गुणन करत दुख भाजत ।
गृह गृह सम्पति सुमति विराजत ॥

गंगहि नेम सहित नित ध्यावत ।
दुर्जनहूं सज्जन पद पावत ॥

उद्दिहिन विद्या बल पावै ।
रोगी रोग मुक्त हवे जावै ॥

गंगा गंगा जो नर कहहीं ।
भूखा नंगा कभुहुह न रहहि ॥

निकसत ही मुख गंगा माई ।
श्रवण दाबी यम चलहिं पराई ॥

महं अघिन अधमन कहं तारे ।
भए नरका के बंद किवारें ॥

जो नर जपी गंग शत नामा ।
सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा ॥

सब सुख भोग परम पद पावहीं ।
आवागमन रहित ह्वै जावहीं ॥

धनि मइया सुरसरि सुख दैनि ।
धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ॥

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा ।
सुन्दरदास गंगा कर दासा ॥

जो यह पढ़े गंगा चालीसा ।
मिली भक्ति अविरल वागीसा ॥

।।दोहा।।

नित नए सुख सम्पति लहैं, धरें गंगा का ध्यान ।
अंत समाई सुर पुर बसल, सदर बैठी विमान ॥

संवत भुत नभ्दिशी, राम जन्म दिन चैत्र ।
पूरण चालीसा किया, हरी भक्तन हित नेत्र ॥

॥ इति श्री गंगा चालीसा ॥

।।दोहा।।

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय॥

।।चौपाई।।

नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥ 
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥ 
तन पर पीतांबर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥ 

शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥ 
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥ 

संतभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥ 
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥ 

पाप काट भव सिंधु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥ 
करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥ 

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥ 
भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥ 

आप वराह रूप बनाया। हरण्याक्ष को मार गिराया॥ 
धर मत्स्य तन सिंधु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥ 

अमिलख असुरन द्वंद मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥ 
देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया॥ 

कूर्म रूप धर सिंधु मझाया। मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥ 
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥ 

वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥ 
मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥ 

असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लडाई॥ 
हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥ 

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥ 
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥ 

देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥ 
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥ 

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥ 
गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥ 

हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥ 
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥ 
जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥ 

शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥ 
करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥ 

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥ 
सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥ 

दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥
पाप दोष संताप नशाओ। भव-बंधन से मुक्त कराओ॥

सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥ 
निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥

।।दोहा।।

सुनि चालीसा जो जन गावै, श्रद्धा भक्ति सहित मन लावै।
विष्णु कृपा तापर अति होई, बांछित फल पावै नर सोई॥

॥दोहा॥

कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।

॥चौपाई॥

जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।।1।।

विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।।2।। 

सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।।3।। 

मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।।4।।

मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,सूर्य, अर्क, खग, कलिहर।।
पूषा, रवि, आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।।5।।

द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।। 
चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।।6।।

नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।।
सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।।7।।

बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।। 
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।।8।।

छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।। 
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।।9।।

सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।।
भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।।10।।

ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।।11।।

पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।। 
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।।12।।

बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।।
जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।।13।।

विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।। 
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।।14।।

अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।। 
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।।15।।

अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।।
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।।16।।

मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।। 
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।।17।।

भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।। 
परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।।18।।

अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांग नाम रवि उदयन।।
भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।।19।।

यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।।20।।

॥दोहा॥

भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

॥ दोहा ॥

जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि।
गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि॥

॥ चालीसा॥

ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे।
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो।।1।।

तेऊ पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हिय सजाता।
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे।।2।।

ललित ललाट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर।
कनक बसन कंचुकि सजाए, कटी मेखला दिव्य लहराए।।3।।

कंठ मदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा।
बालारुण अनंत छबि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी।।4।।

नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजति हरि चतुरानन।
इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित।।5।।

गिर कैलास निवासिनी जय जय, कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय।
त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी, अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी।।6।।

हैं महेश प्राणेश तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे।
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब।।7।।

बूढ़ा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावे कोउ तिनकी।
सदा श्मशान बिहारी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर।।8।।

कण्ठ हलाहल को छबि छायी, नीलकण्ठ की पदवी पायी।
देव मगन के हित अस किन्हो, विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो।।9।।

ताकी, तुम पत्नी छवि धारिणी, दुरित विदारिणी मंगल कारिणी।
देखि परम सौंदर्य तिहारो, त्रिभुवन चकित बनावन हारो।।10।।

भय भीता सो माता गंगा, लज्जा मय है सलिल तरंगा।
सौत समान शम्भू पहआयी, विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी।।11।।

तेहि कों कमल बदन मुरझायो, लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो।
नित्यानंद करी बरदायिनी, अभय भक्त कर नित अनपायिनी।।12।।

अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी, माहेश्वरी, हिमालय नन्दिनी।
काशी पुरी सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी।।13।।

भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री, कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।
रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे, वाचा सिद्ध करि अवलम्बे।।14।।

गौरी उमा शंकरी काली, अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।
सब जन की ईश्वरी भगवती, पतिप्राणा परमेश्वरी सती।।15।।

तुमने कठिन तपस्या कीनी, नारद सों जब शिक्षा लीनी।
अन्न न नीर न वायु अहारा, अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा।।16।।

पत्र घास को खाद्य न भायउ, उमा नाम तब तुमने पायउ।
तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे।।17।।

तब तव जय जय जय उच्चारेउ, सप्तऋषि, निज गेह सिद्धारेउ।
सुर विधि विष्णु पास तब आए, वर देने के वचन सुनाए।।18।।

मांगे उमा वर पति तुम तिनसों, चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।
एवमस्तु कही ते दोऊ गए, सुफल मनोरथ तुमने लए।।19।।

करि विवाह शिव सों भामा, पुनः कहाई हर की बामा।
जो पढ़िहै जन यह चालीसा, धन जन सुख देइहै तेहि ईसा।।20।।

।।दोहा।।

कूटि चंद्रिका सुभग शिर, जयति जयति सुख खा‍नि ।
पार्वती निज भक्त हित, रहहु सदा वरदानि।।

॥इति श्री पार्वती चालीसा॥

।। दोहा ।।

जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू, चतुरानन सुखमूल।
करहु कृपा निज दास पै, रहहु सदा अनुकूल॥
तुम सृजक ब्रह्माण्ड के, अज विधि घाता नाम।
विश्वविधाता कीजिये, जन पै कृपा ललाम

।। चौपाई ।।

जय जय कमलासान जगमूला।
रहहु सदा जनपै अनुकूला॥

रुप चतुर्भुज परम सुहावन।
तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥

रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा।
मस्तक जटाजुट गंभीरा॥

ताके ऊपर मुकुट बिराजै।
दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥

श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर।
है यज्ञोपवीत अति मनहर॥

कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं।
गल मोतिन की माला राजहिं॥

चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये।
दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥

ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा।
अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥

अर्द्धांगिनि तव है सावित्री।
अपर नाम हिये गायत्री॥

सरस्वती तब सुता मनोहर।
वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥

कमलासन पर रहे बिराजे।
तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥

क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा।
नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥

तेहि पर तुम आसीन कृपाला।
सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥

एक बार की कथा प्रचारी।
तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥

कमलासन लखि कीन्ह बिचारा।
और न कोउ अहै संसारा॥

तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा।
अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥

कोटिक वर्ष गये यहि भांती।
भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥

पै तुम ताकर अन्त न पाये।
ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये॥

पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा।
महापघ यह अति प्राचीन॥

याको जन्म भयो को कारन।
तबहीं मोहि करयो यह धारन॥

अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं।
सब कुछ अहै निहित मो माहीं॥

यह निश्चय करि गरब बढ़ायो।
निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये॥

गगन गिरा तब भई गंभीरा।
ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा॥

सकल सृष्टि कर स्वामी जोई।
ब्रह्म अनादि अलख है सोई॥

निज इच्छा इन सब निरमाये।
ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये॥

सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा।
सब जग इनकी करिहै सेवा॥

महापघ जो तुम्हरो आसन।
ता पै अहै विष्णु को शासन॥

विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई।
तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई॥

भौटहु जाई विष्णु हितमानी।
यह कहि बन्द भई नभवानी॥

ताहि श्रवण कहि अचरज माना।
पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना॥

कमल नाल धरि नीचे आवा।
तहां विष्णु के दर्शन पावा॥

शयन करत देखे सुरभूपा।
श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा॥

सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर।
क्रीटमुकट राजत मस्तक पर॥

गल बैजन्ती माल बिराजै।
कोटि सूर्य की शोभा लाजै॥

शंख चक्र अरु गदा मनोहर।
शेष नाग शय्या अति मनहर॥

दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू।
हर्षित भे श्रीपति सुख धामू॥

बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन।
तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन॥

ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना।
ब्रह्मारुप हम दोउ समाना॥

तीसरे श्री शिवशंकर आहीं।
ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही॥

तुम सों होई सृष्टि विस्तारा।
हम पालन करिहैं संसारा॥

शिव संहार करहिं सब केरा।
हम तीनहुं कहँ काज धनेरा॥

अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु।
निराकार तिनकहँ तुम जानहु॥

हम साकार रुप त्रयदेवा।
करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा॥

यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये।
परब्रह्म के यश अति गाये॥

सो सब विदित वेद के नामा।
मुक्ति रुप सो परम ललामा॥

यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा।
पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा॥

नाम पितामह सुन्दर पायेउ।
जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ॥

लीन्ह अनेक बार अवतारा।
सुन्दर सुयश जगत विस्तारा॥

देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं।
मनवांछित तुम सन सब पावहिं॥

जो कोउ ध्यान धरै नर नारी।
ताकी आस पुजावहु सारी॥

पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई।
तहँ तुम बसहु सदा सुरराई॥

कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन।
ता कर दूर होई सब दूषण॥

॥ इति ब्रह्मा चालीसा सम्पूर्ण ॥

(श्री स्कन्द पुराण में वर्णित मंगल स्त्रोत का नित्य श्रद्धा पूर्वक पाठ करने से मंगल के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है।)

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1।।

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः ।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2।। 

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः ।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3।। 

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् ।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥4।।

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥5।।

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः ।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित् ॥6।।

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल ।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय ॥7।।

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः ।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥8।।

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः ।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात् ॥9।। 

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा ।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः ॥10।।

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः ॥11।।

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् ।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा ॥12।।

।।इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥1॥

मन्दाकिनीसलिलेशचर्चिताय नन्दिप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय ॥2॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृक्षसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषभध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥3॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवाशर्चितशेखराय ।
चन्द्राग्निवाश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥4॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥5॥

॥फलश्रुति:॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ ऋणमोचन मङ्गल स्तोत्र ॥

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1।।

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः ।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2।।

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः ।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3।।

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् ।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥4।।

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥5।।

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः ।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित् ॥6।।

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल ।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय ॥7।।

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः ।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥8।।

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः ।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात् ॥9।। 

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा ।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः ॥10।।

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः ॥11।।

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम् ।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा ॥12।। 

।।इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

प्रत्येक 30 वर्ष में शनि का रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश होता है। शनि का रोहिणी नक्षत्र में गोचर सबसे अधिक दुष्प्रभाव देने वाला होता है। मान्यतायों के अनुसार इस तरह की घटना राजा और उसके राज्य के लिए बहुत ही हानिकारक सिद्ध होती है। शनि का रोहिणी नक्षत्र में गोचर के भयावह परिणाम जानकर राजा दशरथ ने शनि देव की आराधना की एवं शनि स्तोत्र की रचना की।  शनि देव प्रसन्न हुए एवं राजा दशरथ के शासनकाल में रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश नहीं किया। इसी कारण शनि स्तोत्र को शनि के प्रकोप से बचने का सर्वोत्तम उपाय माना जाता है।

दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥2॥

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: ।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: ।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥9॥

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

हिन्दी पद्य रूपान्तरण

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण् वाले।
कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥
स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।
सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥
स्वीकारो नमन मेरे।
स्वीकारो भजन मेरे॥
हे दाढी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।
हे दीर्घ नेत्रवाले, शुष्कोदरा निराले॥
भय आकृतितुम्हारी, सब पापियों को मारे।
स्वीकारो नमन मेरे।स्वीकारो भजन मेरे॥
हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।
कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥
तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।
स्वीकारो नमन मेरे।स्वीकारो भजन मेरे॥
हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।
हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥
हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।
हैं पूज्य चरणतेरे।स्वीकारो नमन मेरे॥
हे सूर्य-सुततपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।
हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥
विश्वास श्रध्दा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।
स्वीकारो नमन मेरे।हे पूज्य देव मेरे॥अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।
तप-दग्ध-देहधरी, नित योगरत अपारी॥
संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।स्वीकारो नमन मेरे।
स्वीकारो नमन मेरे॥
नितप्रियसुधा में रत हो,
अतृप्ति में निरत हो।
हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥
हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।स्वीकारो भजन मेरे।
स्वीकारो नमन मेरे॥
जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि।
वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥
उत्ताम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।
स्वीकारो नमन मेरे।स्वीकारो भजन मेरे॥
हो व दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।
मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥
डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।
स्वीकारो नमन मेरे।
शनि पूज्य चरण तेरे॥
हो मूलनाश उनका, दुर्बुध्दि होती जिन पर।
हो देव असुर मानव, हो सिध्द या विद्याधर॥
देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।
स्वीकारो नमन मेरे।स्वीकारो भजन मेरे॥
होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।
बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥
सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।
स्वीकारो नमन मेरे।हैं पूज्य चरण तेरे॥

॥ श्री गणेशायनमः ॥
नारद उवाच -

प्रणम्यं शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम ।
भक्तावासं: स्मरैनित्यंमायु:कामार्थसिद्धये ॥1॥

प्रथमं वक्रतुंडंच एकदंतं द्वितीयकम ।
तृतीयं कृष्णं पिङा्क्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम ॥2॥

लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टकम् ॥3॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ॥4॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेन्नर: ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वासिद्धिकरं प्रभो ॥5॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥6॥

जपेद्वगणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ॥7॥

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वां य: समर्पयेत ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ॥8॥

॥ इति श्रीनारदपुराणे संकष्टनाशनं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्‌ ॥

वाल्मीकि रामायण के अनुसार “आदित्य हृदय स्तोत्र” अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान् श्री राम को युद्ध में रावण पर विजय प्राप्ति हेतु दिया गया था. आदित्य हृदय स्तोत्र का नित्य पाठ जीवन के अनेक कष्टों का एकमात्र निवारण है. इसके नियमित पाठ से मानसिक कष्ट, हृदय रोग, तनाव, शत्रु कष्ट और असफलताओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है. इस स्तोत्र में सूर्य देव की निष्ठापूर्वक उपासना करते हुए उनसे विजयी मार्ग पर ले जाने का अनुरोध है. आदित्य हृदय स्तोत्र सभी प्रकार के पापों , कष्टों और शत्रुओं से मुक्ति कराने वाला, सर्व कल्याणकारी, आयु, उर्जा और प्रतिष्ठा बढाने वाला अति मंगलकारी विजय स्तोत्र है.

 विनियोग

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्यहृदयभूतो
भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।

पूर्व पिठिता 

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ ।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ ।
येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

मूल -स्तोत्र 

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ ।
पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।
एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।
वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ ।
तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।
अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।
कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।
नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।
नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ ।
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥
।।सम्पूर्ण ।।

 हिंदी अनुवाद

1,2 उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे । इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया । यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले ।

3 सबके ह्रदय में रमन करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो ! वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे । 

4,5  इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’ । यह परम पवित्र और संपूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है । इसके जप से सदा विजय कि प्राप्ति होती है । यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है । सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है । इससे सब पापों का नाश हो जाता है । यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु का बढ़ाने वाला उत्तम साधन है ।

6 भगवान् सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं । ये नित्य उदय होने वाले, देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान नाम से प्रसिद्द, प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी हैं । तुम इनका रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराये नमः इन मन्त्रों के द्वारा पूजन करो।

7 संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं । ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं । ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं । 

8,9 ये ही ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं ।  

10,11,12,13,14,15 इनके नाम हैं आदित्य(अदितिपुत्र), सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्वव्यापक), खग, पूषा(पोषण करने वाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य, भानु(प्रकाशक), हिरण्यरेता(ब्रह्मांड कि उत्पत्ति के बीज), दिवाकर(रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व, सहस्रार्चि(हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति(सात घोड़ों वाले), मरीचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमंथन(अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तण्डक(ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने वाले), अंशुमान, हिरण्यगर्भ(ब्रह्मा), शिशिर(स्वभाव से ही सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर, रवि, अग्निगर्भ(अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन(शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ(आकाश के स्वामी), तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विंध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलने वाले), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल(भूरे रंग वाले), सर्वतापन(सबको ताप देने वाले), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन(जगत कि रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी और द्वादशात्मा हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है ।

16 पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है । ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है । 

17 आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं । आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं । आपको बारबार नमस्कार है । सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है । आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्द हैं, आपको नमस्कार है ।

18 उग्र, वीर, और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है ।

19 आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है ।

20 आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं । आपका स्वरुप अप्रमेय है । आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, संपूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ।

21 आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरी और विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।

22 रघुनन्दन ! ये भगवान् सूर्य ही संपूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं । ये अपनी किरणों से गर्मी पहुंचाते और वर्षा करते हैं ।

23 ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से  स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं ।

24 देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं । संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं ।

25 राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता ।

26 इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर कि पूजा करो । इस आदित्यहृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।

27 महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे । यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए ।

28,29,30 उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया । उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की और देखते हुए इसका तीन बार जप किया । इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर रावण की और देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढे । उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया ।

31 उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा – ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’ ।

इस प्रकार भगवान् सूर्य कि प्रशंसा में कहा गया और वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में वर्णित यह आदित्य हृदयम मंत्र संपन्न होता है ।

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थलेगलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयंचकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥ 

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावकेकिशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥ 

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥ 

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरेमनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥ 

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकःश्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥ 

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरंमहा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥ 

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥ 

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरःकलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥ 

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदंगजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥ 

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकंगजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥ 

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोःसमं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥ 

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकःशिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥ 

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशंपरिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥ 

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणीमहाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिःशिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥ 

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवंपठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिंविमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतंयः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तांलक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥ 

॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

जय भगवति देवि नमो वरदे, जयपापविनाशिनी बहुफलदे।
जयशुम्भनिशुम्भकपालधरे, प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे।।1।।

जयचन्द्रदिवाकरनेत्रधरे, जय पावकभूषितवक्त्रवरे।
जय भैरवदेहनिलीनपरे, जय अन्धकदैत्यविशोषकरे।।2।।

जय महिषविमर्दिनी शूलकरे,जय लोकसमस्तकपापहरे।
जयदेवि पितामहविष्णुनते,जय भास्करशक्रशिरोवनते।।3।। 

जय षण्मुखसायुधईशनुते,जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दुःखदरिद्रविनाशकरे,जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे।।4।।

जय देवि समस्तशरीरधरे,जय नाकविदर्शिनी दुख हरे।
जय व्याधिविनाशिनी मोक्षकरे,जय वांछितदायिनी सिद्धिवरे।।5।। 

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतःशुचिः।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा।।6।।

॥ इति व्यासकृतं भगवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

।। परशुराम-कृत श्रीदुर्गा-स्तोत्र ।।

।। परशुराम उवाच ।।

श्रीकृष्णस्य च गो-लोके-परिपूर्णतमस्य चः।
आविर्भूता विग्रहतः, परा सृष्ट्युन्मुखस्य च ।।

सूर्य-कोटि-प्रभा-युक्ता, वस्त्रालंकार भूषिता।
वह्नि-शुद्धांशुकाधाना सुस्मिता, सुमनोहरा ।।

नव-यौवन-सम्पन्ना सिन्दूर- विन्दु-शोभिता।
ललितं कबरीभारं मालती-माल्य-मण्डितम् ।।

अहोऽनिर्वचनीया त्वं, चारुमूर्ति च बिभ्रती।
मोक्षप्रदा मुमुक्षूणां, महाविष्णोर्विधिः स्वयम् ।।

मुमोह क्षणमात्रेण दृष्ट्वा, त्वां सर्वमोहिनीम्।
बालैः सम्भूय सहसा, सस्मिता धाविता पुरा ।।

सद्भिः ख्याता तेन, राधा मूलप्रकृतिरीश्वरी।
कृष्णस्त्वां सहसाहूय, वीर्याधानं चकार ह ।।

ततो डिम्भं महज्जज्ञे, ततो जातो महाविराट्।
यस्यैव लोमकूपेषु, ब्रह्माण्डान्यखिलानि च ।।

तच्छृङ्गारक्रमेणैव त्वन्निःश्वासो बभूव ह।
स निःश्वासो महावायुः स विराड् विश्वधारकः ।।

तव घर्मजलेनैव पुप्लुवे विश्वगोलकम्।
स विराड् विश्वनिलयो जलराशिर्बभूव ह ।।

ततस्त्वं पञ्चधाभूय पञ्चमूर्तीश्च बिभ्रती।
प्राणाधिष्ठातृमूर्त्तिर्या कृष्णस्य परमात्मनः ।।

कृष्णप्राणाधिकां राधां तां वदन्ति पुराविदः ।।

वेदाधिष्ठात्रीमूर्तियां वेदाशास्त्रप्रसूरपि।
तं सावित्रीं शुद्धरूपां प्रवदन्ति मनीषिणः ।।

ऐश्वर्याधिष्ठात्रीमूर्तिः शान्तिश्च शान्तरूपिणी।
लक्ष्मीं वदन्ति संतस्तां शुद्धां सत्त्वस्वरुपिणीम् ।।

रागाधिष्ठात्री या देवी, शुक्लमूर्तिः सतां प्रसूः।
सरस्वतीं तां शास्त्रज्ञां प्रवदन्ति बुधा भुवि ।।

बुद्धिर्विद्या सर्वशक्तिर्ज्या मूर्तिरधिदेवता।
सर्वमङ्गलमङ्गल्या सर्वमङ्गलरूपिणी ।।

सर्वमङ्गलबीजस्य शिवस्य निलयेऽधुना ।।

शिवे शिवास्वरूपा त्वं लक्ष्मीर्नारायणान्तिके।
सरस्वती च सावित्री वेदसूर्ब्रह्मणः प्रिया ।।

राधा रासेश्वरस्यैव परिपूर्णतमस्य च।
परमानन्द-रूपस्य परमानन्दरूपिणी ।।

त्वत्कलांशांशकलया देवानामपि योषितः ।।

त्वं विद्या योषितः सर्वास्त्वं सर्वबीजरूपिणी।
छाया सूर्यस्य चन्द्रस्य रोहिणी सर्वमोहिनी ।।

शची शक्रस्य कामस्य कामिनी रतिरीश्वरी।
वरुणानी जलेशस्य वायोः स्त्री प्राणवल्लभा ।।

वह्नेः प्रिया हि स्वाहा च कुबेरस्य च सुन्दरी।
यमस्य तु सुशीला च नैर्ऋतस्य च कैटभी ।।

ईशानस्य शशिकला शतरूपा मनोः प्रिया।
देवहूतिः कर्दमस्य वसिष्ठस्याप्यरुन्धती ।।

लोपामुद्राप्यगस्त्यस्य देवमातादितिस्तथा।
अहल्या गौतमस्यापि सर्वाधारा वसुन्धरा ।।

गङ्गा च तुलसी चापि पृथिव्यां याः सरिद्वराः।
एताः सर्वाश्च या ह्यन्याः सर्वास्त्वत्कलयाम्बिके ।।

गृहलक्ष्मीगृहे नृणांराजलक्ष्मीश्च राजसु।
तपस्विनां तपस्या त्वं गायत्री ब्राह्मणस्य च ।।

सतां सत्त्वस्वरूपा त्वमसतां कलहाङ्कुरा।
ज्योतीरूपा निर्गुणस्य शक्ति स्त्वं सगुणस्य च ।।

सूर्ये प्रभास्वरूपा त्वं दाहिका च हुताशने।
जले शैत्यस्वरूपा च शोभारूपा निशाकरे ।।

त्वं भूमौ गन्धरूपा च आकाशे शब्दरूपिणी।
क्षुत्पिपासादयस्त्वं च जीविनां सर्वशक्तयः ।।

सर्वबीजस्वरूपा त्वं संसारे साररूपिणी।
स्मृतिर्मेधा च बुद्धिर्वा ज्ञानशक्ति र्विपश्चिताम् ।।

कृष्णेन विद्या या दत्ता सर्वज्ञानप्रसूः शुभा।
शूलिने कृपया सा त्वं यतो मृत्युञ्जयः शिवः ।।

सृष्टिपालनसंहारशक्त यस्त्रिविधाश्च याः।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां सा त्वमेव नमोऽस्तु ते ।।

मधुकैटभभीत्या च त्रस्तो धाता प्रकम्पितः।
स्तुत्वा मुमोच यां देवीं तां मूर्ध्ना प्रणमाम्यहम्।।

मधुकैटभयोर्युद्धे त्रातासौ विष्णुरीश्वरीम्।
बभूव शक्तिमान् स्तुत्वा तां दुर्गां प्रणमाम्यहम्।।

त्रिपुरस्य महायुद्धे सरथे पतिते शिवे।
यां तुष्टुवुः सुराः सर्वे तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ।।

विष्णुना वृषरूपेण स्वयं शम्भुः समुत्थितः।
जघान त्रिपुरं स्तुत्वा तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ।।

यदाज्ञया वाति वातः सूर्यस्तपति संततम्।
वर्षतीन्द्रो दहत्यग्निस्तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ।।

यदाज्ञया हि कालश्च शश्वद् भ्रमति वेगतः।
मृत्युश्चरति जन्त्वोघे तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ।।

स्त्रष्टा सृजति सृष्टिं च पाता पाति यदाज्ञया।
संहर्ता संहरेत् काले तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ।।

ज्योतिःस्वरूपो भगवाञ्छ्रीकृष्णो निर्गुणः स्वयम्।
यया विना न शक्तश्च सृष्टिं कर्त्तुं नमामि ताम् ।।

रक्ष रक्ष जगन्मातरपराधं क्षमस्व मे।
शिशूनामपराधेन कुतो माता हि कुप्यति ।।

इत्युत्तवा पर्शुरामश्च प्रणम्य तां रुरोद ह।
तुष्टा दुर्गा सम्भ्रमेण चाभयं च वरं ददौ ।।

अमरो भव हे पुत्र वत्स सुस्थिरतां व्रज।
शर्वप्रसादात् सर्वत्र ज्योऽस्तु तव संततम् ।।

सर्वान्तरात्मा भगवांस्तुष्टोऽस्तु संततं हरिः।
भक्तिर्भवतु ते कृष्णे शिवदे च शिवे गुरौ ।।

इष्टदेवे गुरौ यस्य भक्तिर्भवति शाश्वती।
तं हन्तु न हि शक्ताश्च रुष्टाश्च सर्वदेवताः ।।

श्रीकृष्णस्य च भक्तस्त्वं शिष्यो हि शंकरस्य च।
गुरुपत्नीं स्तौषि यस्मात् कस्त्वां हन्तुमिहेश्वरः ।।

अहो न कृष्णभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
अन्यदेवेषु ये भक्ता न भक्ता वा निरेङ्कुशाः ।।

चन्द्रमा बलवांस्तुष्टो येषां भाग्यवतां भृगो।
तेषां तारागणा रुष्टाः किं कुर्वन्ति च दुर्बलाः ।।

यस्य तुष्टः सभायां चेन्नरदेवो महान् सुखी।
तस्य किं वा करिष्यन्ति रुष्टा भृत्याश्च दुर्बलाः ।।

इत्युक्त्वा पार्वती तुष्टा दत्त्वा रामं शुभाशिषम्।
जगामान्तःपुरं तूर्णं हरिशब्दो बभूव ह ।।

।। फल-श्रुति।।

स्तोत्रं वै काण्वशाखोक्तं पूजाकाले च यः पठेत्।
यात्राकाले च प्रातर्वा वाञ्छितार्थं लभेद्ध्रुवम ||

पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी कन्यकां लभेत्।
विद्यार्थी लभते विद्यां प्रजार्थी चाप्नुयात् प्रजाम् ।।

भ्रष्टराज्यो लभेद् राज्यं नष्टवित्तो धनं लभेत् ।।

यस्य रुष्टो गुरुर्देवो राजा वा बान्धवोऽथवा।
तस्य तुष्टश्च वरदः स्तोत्रराजप्रसादतः।।

दस्युग्रस्तोऽहिग्रस्तश्च शत्रुग्रस्तो भयानकः।
व्याधिग्रस्तो भवेन्मुक्तः स्तोत्रस्मरणमात्रतः ।।

राजद्वारे श्मशाने च कारागारे च बन्धने।
जलराशौ निमगन्श्च मुक्त स्तत्स्मृतिमात्रतः ।।

स्वामिभेदे पुत्रभेदे मित्रभेदे च दारुणे।
स्तोत्रस्मरणमात्रेण वाञ्छितार्थं लभेद् ध्रुवम ||

कृत्वा हविष्यं वर्षं च स्तोत्रराजं श्रृणोति या।
भक्तया दुर्गां च सम्पूज्य महावन्ध्या प्रसूयते ।।

लभते सा दिव्यपुत्रं ज्ञानिनं चिरजीविनम्।
असौभाग्या च सौभाग्यं षण्मासश्रवणाल्लभेत् ।।

नवमासं काकवन्ध्या मृतवत्सा च भक्तितः।
स्तोत्रराजं या श्रृणोति सा पुत्रं लभते ध्रुवम् ।।

कन्यामाता पुत्रहीना पञ्चमासं शृणोति या।
घटे सम्पूज्य दुर्गां च सा पुत्रं लभते ध्रुवम् ।।

॥ श्री शिव कृत दुर्गा स्तोत्र ॥

रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि।
मां भक्तमनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि ॥ 1॥

विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि।
ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणी ॥ 2॥

त्वं च ब्रह्मादिदेवानामम्बिके जगदम्बिके।
त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात् ॥ 3॥

मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृतिः स्वयम्।
तयोः परं ब्रह्म परं त्वं बिभर्षि सनातनि ॥ 4॥

वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी ॥ 5॥

मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिनः।
स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले ॥ 6॥

नागादिलक्ष्मीः पाताले गृहेषु गृहदेवता।
सर्वसस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी ॥ 7॥

रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती।
प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मनः ॥ 8॥

गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि।
गोलोकाधिष्ठाता देवी वृन्दावनवने वने ॥ 9॥

श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी।
शतश‍ृङ्गाधिदेवी त्वं नाम्ना चित्रावलीति च ॥ 10॥

दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्रकल्पे च शैलजा।
देवमाता दितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा ॥ 11॥

त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती।
त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषितः ॥ 12॥

स्त्रीरूपं चापि पुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम्।
वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टौ चाङ्कुररूपिणी ॥ 13॥

वह्नौ च दाहिका शक्तिर्जले शैत्यस्वरूपिणी।
सूर्ये तेजस्वरूपा च प्रभारूपा च सन्ततम् ॥ 14॥

गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी।
शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसङ्घे च निश्चितम् ॥ 15॥

सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा च पालने परिपालिका।
महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी ॥ 16॥

क्षुत् त्वं दया त्वं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी।
तुष्टिस्त्वं चपि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयम् ॥ 17॥

शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्तिः कान्तिस्त्वं कीर्तिरेव च।
लज्जा त्वं च तथा माया भुक्तिमुक्तिस्वरूपिणी ॥ 18॥

सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी।
वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन ॥ 19॥

सहस्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न शक्तः सुरेश्वरि।
वेदाः न शक्ताः को विद्वान् न च शक्ता सरस्वती ॥ 20॥

स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णुः सनातनः।
किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि ।
कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु ॥ 21॥

॥ इति श्री शिव कृत दुर्गास्तोत्रं सम्पूर्ण:।।

।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।।

अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया: ।।1।।

मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया: ।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय: ।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया: ।।4।।

बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया: ।।5।।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया: ।।6।।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया: ।।7।।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह: ।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया: ।।9।।

गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै ।।11।।

नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै ।।12।।

सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम् ।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ।।14।।

सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।15।।

दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम् ।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया: ।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्। 
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया: ।।18।।

।।इति कनक धारा स्त्रोत समाप्त।।

॥ विनियोग:॥

अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः।
श्री सीतारामचंद्रो देवता।
अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः।
श्रीमान हनुमान कीलकम।
श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः।

॥ अथ ध्यानम्‌:॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं,
पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम।
वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्नी,
रदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम॥

राम रक्षा स्तोत्रम्:

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं ॥2॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥3॥

रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥

कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः ॥8॥

जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः ॥9॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥

पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन ।
नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत ।
अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥14॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः प्रभुः ॥16॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम ॥20॥

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥

रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥

इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥

रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥25॥

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं,
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं,
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम ॥26॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥

श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम,
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥

श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीराम चन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥30॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम ॥34॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥

रामो राजमणिः सदा विजयते,
रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता,
निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं,
रामस्य दासोस्म्यहं रामे चित्तलयः,
सदा भवतु मे भो राम मामुद्धराः ॥37॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

॥ इति श्री राम रक्षा स्तोत्रं संपूर्णम् ॥ 

सूर्य स्तोत्र 

विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।
लोक प्रकाशकः श्री मांल्लोक चक्षुर्मुहेश्वरः॥

लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥

गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः सदा रवेः॥

॥श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम॥

1. आदि लक्ष्मी

सुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि,
चन्द्र सहोदरि हेममये,
मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायिनि,
मंजुल भाषिणी वेदनुते ।
पंकजवासिनी देव सुपूजित,
सद्गुण वर्षिणी शान्तियुते,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
आद्य लक्ष्मी परिपालय माम् ॥1॥

2. धान्य लक्ष्मी

अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनी,
वैदिक रूपिणि वेदमये,
क्षीर समुद्भव मंगल रूपणि,
मन्त्र निवासिनी मन्त्रयुते ।
मंगलदायिनि अम्बुजवासिनि,
देवगणाश्रित पादयुते,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
धान्यलक्ष्मी परिपालय माम्॥2॥

3. धैर्य लक्ष्मी

जयवरवर्षिणी वैष्णवी भार्गवि,
मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये,
सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद,
ज्ञान विकासिनी शास्त्रनुते ।
भवभयहारिणी पापविमोचिनी,
साधु जनाश्रित पादयुते,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
धैर्यलक्ष्मी परिपालय माम् ॥3॥

4. गज लक्ष्मी

जय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि,
सर्वफलप्रद शास्त्रमये,
रथगज तुरगपदाति समावृत,
परिजन मण्डित लोकनुते ।
हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित,
ताप निवारिणी पादयुते,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
गजरूपेणलक्ष्मी परिपालय माम् ॥4॥

5. संतान लक्ष्मी

अयि खगवाहिनि मोहिनी चक्रिणि,
राग विवर्धिनि ज्ञानमये,
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि,
सप्तस्वर भूषित गाननुते ।
सकल सुरासुर देवमुनीश्वर,
मानव वन्दित पादयुते,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
सन्तानलक्ष्मी परिपालय माम् ॥5॥

6. विजय लक्ष्मी

जय कमलासिनि सद्गति दायिनि,
ज्ञान विकासिनी ज्ञानमये,
अनुदिनमर्चित कुन्कुम धूसर,
भूषित वसित वाद्यनुते ।
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित,
शंकरदेशिक मान्यपदे,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
विजयलक्ष्मी परिपालय माम् ॥6॥

7. विद्या लक्ष्मी

प्रणत सुरेश्वर भारति भार्गवि,
शोकविनाशिनि रत्नमये,
मणिमय भूषित कर्णविभूषण,
शान्ति समावृत हास्यमुखे ।
नवनिधि दायिनि कलिमलहारिणि,
कामित फलप्रद हस्तयुते,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
विद्यालक्ष्मी सदा पालय माम् ॥7॥

8. धन लक्ष्मी

धिमिधिमि धिन्दिमि धिन्दिमि,
दिन्धिमि दुन्धुभि नाद सुपूर्णमये,
घुमघुम घुंघुम घुंघुंम घुंघुंम,
शंख निनाद सुवाद्यनुते ।
वेद पुराणेतिहास सुपूजित,
वैदिक मार्ग प्रदर्शयुते,
जय जय हे मधुसूदन कामिनी,
धनलक्ष्मी रूपेणा पालय माम् ॥8॥

फ़ल शृति

अष्टलक्ष्मी नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।
विष्णु वक्ष:स्थलारूढ़े भक्त मोक्ष प्रदायिनी॥
शंख चक्रगदाहस्ते विश्वरूपिणिते जय: ।
जगन्मात्रे च मोहिन्यै मंगलम् शुभ मंगलम्॥

॥ इति श्रीअष्टलक्ष्मी स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

ग्रहों द्वारा होने वाले कष्टों के निवारण हेतु इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत लाभदायक है। इसमें सूर्य सहित  हर ग्रह से एक-एक श्लोक के द्वारा पीड़ा दूर करने की प्रार्थना की गई है- 

।। नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्र ।।

1. सूर्य ग्रह

ग्रहाणामादिरात्यो लोकरक्षणकारक:।
विषमस्थानसम्भूतां पीड़ां हरतु मे रवि: ।।1।।

2. चंद्र ग्रह

रोहिणीश: सुधा‍मूर्ति: सुधागात्र: सुधाशन:।
विषमस्थानसम्भूतां पीड़ां हरतु मे विधु: ।।2।।

3. मंगल (कुज) ग्रह

भूमिपुत्रो महातेजा जगतां भयकृत् सदा।
वृष्टिकृद् वृष्टिहर्ता च पीड़ां हरतु में कुज: ।।3।।

4. बुध ग्रह

उत्पातरूपो जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युति:।
सूर्यप्रियकरो विद्वान् पीड़ां हरतु मे बुध: ।।4।।

5. गुरु (बृहस्पति) ग्रह

देवमन्त्री विशालाक्ष: सदा लोकहिते रत:।
अनेकशिष्यसम्पूर्ण:पीड़ां हरतु मे गुरु: ।।5।।

6. शुक्र ग्रह

दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामति:।
प्रभु: ताराग्रहाणां च पीड़ां हरतु मे भृगु: ।।6।।

7. शनि ग्रह

सूर्यपुत्रो दीर्घदेहा विशालाक्ष: शिवप्रिय:।
मन्दचार: प्रसन्नात्मा पीड़ां हरतु मे शनि: ।।7।।

8. केतु ग्रह

अनेकरूपवर्णेश्च शतशोऽथ सहस्त्रदृक्।
उत्पातरूपो जगतां पीडां पीड़ां मे तम: ।।8।।

9. राहु ग्रह

महाशिरा महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबल:।
अतनुश्चोर्ध्वकेशश्च पीड़ां हरतु मे शिखी: ।।9।।

॥ इति नवग्रह पीडा हर स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ धन लक्ष्मी स्तोत्र ॥

नमो कल्याणदायिके।
महासम्पत्प्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥

महाभोगप्रदे देवि महाकामप्रपूरिते।
सुखमोक्षप्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥

ब्रह्मरूपे सदानन्दे सच्चिदानन्दरूपिणी।
धृतसिद्धिप्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥

उद्यत्सूर्यप्रकाशाभे उद्यदादित्यमण्डले।
शिवतत्वप्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥

शिवरूपे शिवानन्दे कारणानन्दविग्रहे।
विश्वसंहाररूपे च धनदायै नमोऽस्तुते॥

पञ्चतत्वस्वरूपे च पञ्चाचारसदारते।
साधकाभीष्टदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥

॥ श्रीं ॐ ॥

श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिका।
समेताय श्री चन्द्रमौळीश्वर परब्रह्मणे नमः॥

॥ जय जय शङ्कर हर हर शङ्कर ॥

।। इति श्री धनलक्ष्मी स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

अग्रे कुरूनाम् अथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृत वस्त्रकेशा।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथ गोविंद दामोदर माधवेति॥

श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे।
त्रायस्व माम् केशव लोकनाथ गोविंद दामोदर माधवेति॥

विक्रेतुकाम अखिल गोपकन्या मुरारी पदार्पित चित्तवृत्त्यः।
दध्योदकं मोहवसादवोचद् गोविंद दामोदर माधवेति॥

जगधोय दत्तो नवनीत पिण्डः गृहे यशोदा विचिकित्सयानि।
उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविंद दामोदर माधवेति॥

जिह्वे रसाग्रे मधुरा प्रिया त्वं सत्यं हितं त्वं परमं वदामि।
अवर्णयेत मधुराक्षराणि गोविंद दामोदर माधवेति॥

गोविंद गोविंद हरे मुरारे गोविंद गोविंद मुकुंद कृष्ण।
गोविंद गोविंद रथांगपाणे गोविंद दामोदर माधवेति॥

सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम्।
देहावसाने त्विदमेव जप्यं गोविंद दामोदर माधवेति॥

वक्तुं समर्थोपि नवक्ति कश्चित् अहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम्।
जिह्वे पिबस्वमृतमेतदेव गोविंद दामोदर माधवेति॥

॥ गायत्री स्तोत्रम् ॥

सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम।
शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं।
परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥1॥

विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम्
निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं अतुलां।
जगत् ज्येष्ठां श्रेष्ठां सुर असुर पूज्यां श्रुतिनुतां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥12॥

तपो निष्ठां अभिष्टां स्वजनमन संताप शमनीम
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैक सुलभां।
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भवबन्धाप हरणीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥3॥

सदा आराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकां आलोकां ह्रदयगत मोहान्धहरणीं।
परां दिव्यां भव्यां अगम भव सिन्ध्वेक तरणीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥4॥

अजां द्वैतां त्रेतां विविध गुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीं।
महामान्यां धन्यां सततकरूणाशील विभवां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥15॥

जगत् धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमलतपो राशि सरणीं।
अनैकां ऐकां वै त्रयजगत् अधिष्ठान् पदवीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥6॥

प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनयति जाड्यापहरणीं
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीं।
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥7॥

अनन्तां शान्तां यां भजति वुध वृन्दः श्रुतिमयीम
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति ह्रदि नित्यं सुरपतिः।
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रितिवशगां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम ॥8॥

शुद्ध चितः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम्।
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति ॥9॥

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 1 ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 2 ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 3 ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 4 ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 5 ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 6 ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 7 ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 8 ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 9 ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 10 ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 11 ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 12 ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 13 ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 14 ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 15 ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 16 ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 17 ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 18 ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 19 ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 20 ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 21 ॥

“विष्णु सहस्रनाम” भगवान विष्णु के हजार नामों से रचा गया एक प्रमुख स्तोत्र है। हिन्दू धर्मानुसार यह सबसे पवित्र तथा प्रचलित स्तोत्रों में से एक है।महाभारत ,पद्म पुराण व मत्स्य पुराण में  विष्णु सहस्रनाम के  संस्करण उपलब्ध है।  प्रत्येक नाम भगवान् विष्णु  के  गुणों  को सूचित करता है। विष्णु सहस्रनाम सुनने या पठन से मनुष्य की मनोकामनाएँ पूर्ण होने की मान्यता है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:
 
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ 2॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6॥

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8॥

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ 9॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10॥

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ 11॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13॥

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ 14॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19॥

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23॥

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26॥

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ 27॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32॥

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33॥

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ 36॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37॥

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40॥

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42॥

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः। (विरामो विरतो)
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ 43॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45॥

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ 47॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ 49॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53॥

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥ 54॥ (विनियो जयः)

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ 55॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश‍ृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ 58॥

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59॥

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः।
दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61॥ (दिविस्पृक्)

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ 62॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ 66॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ 68॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ 70॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ 76॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77॥

एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम्।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80॥

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश‍ृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81॥

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82॥

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः।
अर्को वाजसनः श‍ृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ 88॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ 92॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99॥

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101॥

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103॥

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107॥

सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ 108॥

श्रीवासुदेवोऽभिरक्षतु ॐ नम इति ।

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